'रात्र'
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'रात्रीला उत्तर देता देता ये उत्तररात्र
प्रश्न जरी ना सुटले, उलगडे तरीही रात्र
केसांत माळला गजरा अलगद विलगत जातो,
सलगी करू पहाते मोकळी सुगंधी रात्र
हे काय क्षणांचे अमृत, ओठांनी प्राशन केले
आसुसल्या ओठांशी ओठांवर खेळे रात्र
अवखळशा स्पर्शाचे, सर्वांगी नर्तन चाले
रंध्रारंध्रातुन तेव्हा रोमांचित होते रात्र
श्वासांची लयकारी उष्णाने प्रसरण पावे
संथातून अतीद्रुताचा, मग प्रवास करते रात्र
वेगावर होऊन स्वार, सामावून घे तूफान,
अखेर रिक्त थकिस्त, विरक्त होते रात्र
गुंफण केल्या हाती, सरते तरीही उरते,
उरता उरता सरते, अन् पहाट होते रात्र'
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-कौस्तुभ
१२-४-२०१६
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